स्टारलिंक: क्या एलन मस्क की कंपनी के आने से भारत में बढ़ेगी इंटरनेट की स्पीड और सस्ता होगा इंटरनेट?
मोबाइल और इंटरनेट सर्विस कंपनी के बाद अब ने भी स्टारलिंक इंटरनेट सेवाओं को भारत लाने के लिए एलन मस्क की कंपनी स्टार स्पेसएक्स से करार कर लिया है.
स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस है, जिसका संचालन एलन मस्क की कंपनी स्पेस एक्स करती है. सैटेलाइट ब्रॉडबैंड, सैटेलाइट कवरेज के अंदर कहीं भी इंटरनेट की सुविधा मुहैया करा सकता है.
एलन मस्क दुनिया के सबसे अमीर शख़्स हैं. वो स्पेसएक्स, टेस्ला और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) के मालिक हैं. इस समय वो अमेरिकी प्रशासन में अहम भूमिका निभा रहे हैं.
स्टारलिंक हाई स्पीड इंटरनेट सर्विस मुहैया कराती है और इससे दूरदराज के उन इलाकों में भी इंटरनेट सर्विस पहुंच सकती है, जहां पारंपरिक इंटरनेट सर्विस पहुंचने में दिक्कत आती है.

बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ करें

स्टारलिंक की सेवाएं फ़िलहाल 100 से ज़्यादा देशों में उपलब्ध हैं. भारत के पड़ोसी देश भूटान में भी इसकी सेवाएं हैं.
हालांकि भारत में अभी तक स्टारलिंक को नियामकों की मंजूरी नहीं मिली है और इसे लेकर सुरक्षा चिंताएं भी हैं.
लेकिन अब अगर इसे मंजूरी मिल जाती है तो ये भारत में इंटरनेट सेवाओं की तस्वीर बदल सकती है.
मुकेश अंबानी और भारती एयरटेल के चेयरमैन सुनील मित्तल सैटेलाइट स्पेक्ट्रम का आवंटन प्रशासनिक तरीके के बजाय नीलामी से करने के पक्ष में रहे हैं.
लेकिन एलन मस्क नीलामी मॉडल के आलोचक हैं.
सुनील मित्तल का कहना है कि शहर के लोगों को इंटरनेट सर्विस मुहैया कराने की इच्छा रखने वाली कंपनियों को बाकी कंपनियों की तरह टेलीकॉम लाइसेंस लेना चाहिए और स्पेक्ट्रम खरीदना चाहिए.
मित्तल भारत के दूसरे सबसे बड़े वायरलेस ऑपरेटर हैं. वो अंबानी के साथ टेलीकॉम बाज़ार के 80 फ़ीसदी हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं.
पारंपरिक ब्रॉडबैंड सेवाएं अंडग्राउंड फाइबर केबल और सेल्युलर टावरों पर निर्भर होती है. वहीं स्टारलिंक 'लो अर्थ ऑर्बिट' सैटेलाइटों के ज़रिये इंटरनेट एक्सेस मुहैया कराती है.
सैटेलाइट सिग्नल्स, ज़मीन पर मौजूद रिसीवर्स तक पहुंचते हैं और उसे इंटरनेट डेटा में तब्दील कर देते हैं.
मस्क की कंपनी स्टारलिंक के पास फिलहाल ऑर्बिट में लगभग 7000 सैटेलाइट मौजूद हैं. इसके 100 देशों में 40 लाख सब्सक्राइबर्स हैं.
मस्क ने कहा है कि वह हर पांच साल में नई टेक्नोलॉजी से इसे अपने नेटवर्क को अपग्रेड करते रहेंगे.
मस्क साल 2021 में ही भारत में सेवाएं शुरू करना चाह रहे थे, लेकिन नियम-कानूनों की मुश्किलों के कारण इसमें देरी आई.
यूजर को स्टारलिंक की सर्विस के लिए स्टारलिंक डिश और राउटर की जरूरत होगी जो पृथ्वी के चारों ओर चक्कर काट रहे सैटेलाइटों से कम्युनिकेट करेगा.
ये डिश अपने आप सबसे नजदीकी स्टारलिंक सैटेलाइन कलस्टर से जुड़ जाएगा. इससे बगैर किसी अड़चन के कनेक्टिविटी मिल जाएगी.
स्टारलिंक को फिक्स्ड लोकेशन में इस्तेमाल होने के लिए डिजाइन किया गया है लेकिन अतिरिक्त हार्डवेयर के जरिये ये चलते वाहनों, नावों और विमानों में भी इंटरनेट एक्सेस मुहैया करा सकता है.
कम लेटेंसी ( 25 से 60 मिली सेकेंड) में ही काम कर लेता है. जबकि पारंपरिक जियोस्टेशनरी सैटेलाइट इंटरनेट 600 से ज्यादा मिलीसेकेंड में काम करते हैं.
इस तेजी की वजह से ही स्टारलिंक की सेवाएं वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, ऑनलाइन गेमिंग और एचडी स्ट्रीमिंग के लिए ज्यादा मुफ़ीद मानी जाती है. हालांकि जियो फाइबर और एयरटेल एक्सट्रीम जैसे पारंरपरिक फाइबर आधारित ब्रॉडबैंड शहरी इलाकों में काफी अच्छी स्पीड देते हैं.
स्टारलिंक को भारत के ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में फ़ायदा मिल सकता है जहां फाइबर कनेक्टिविटी नहीं है या उनकी सर्विस ज्यादा अच्छा नहीं है.
स्टारलिंक के आने के बाद भारत के ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी को काफी मजबूती मिल सकती है.
हालांकि ये इस बात पर निर्भर करेगा कि स्टारलिंक की सेवाएं मौजूदा सेवाओं के मुकाबले कितनी सस्ती रहती हैं.
स्टारलिंक के प्लान अभी भारत में लॉन्च नहीं हुए हैं. लेकिन भूटान में मौजूद स्टारलिंक की सेवाओं की कीमतों से ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में इसकी क्या कीमत हो सकती है.
हर महीने 3000 नोंग्त्रुम यानी भूटानी करेंसी में उपलब्ध है. भारत और भूटान के करेंसी का मूल्य एक समान है इसलिए ये क़ीमत भारतीय करेंसी में भी उतनी ही होगी.
भूटान में इसकी स्पीड 23 एमबीपीसी और 100 एमबीपीएस के बीच है. ब्राउजिंग, सोशल मीडिया और वीडियो स्ट्रीमिंग के लिए ये मुफ़ीद है.
वहीं 25 एमबीपीएस से लेकर 110 एमबीपीएस वाली रेजिडेंशियल प्लान की कीमत 4200 नोंग्त्रुम यानी 4200 रुपयों के बराबर है.
टेलीकॉम मार्केट के जानकारों का अनुमान है कि भारत में स्टारलिंक की सर्विस 3500 रुपये से लेकर 4500 रुपये के बीच हो सकती है. हालांकि रिलायंस जियो और भारती एयरटेल के साथ करार होने से ये सस्ती हो सकती है.

कंसल्टिंग कंपनी ई वाई पार्थेनन के मुताबिक़, भारत के 140 करोड़ लोगों में से लगभग 40 फ़ीसदी लोगों के पास अब भी इंटरनेट की पहुंच नहीं है, इनमें ज़्यादातर ग्रामीण इलाक़ों से हैं.
चीन की बात करें तो दुनिया भर के ऑनलाइन ट्रेंड पर नज़र रखने वाली डेटा रिपोर्ट के मुताबिक, चीन में क़रीब 1.09 अरब इंटरनेट यूज़र्स हैं, जबकि भारत के 75 करोड़ से ज्यादा इंटरनेट यूजर हैं.
भारत में इंटरनेट अपनाने की दर अभी भी वैश्विक औसत से पीछे है. फिलहाल ये 66.2 फ़ीसदी है. लेकिन हाल में हुए अध्ययनों से पता चलता है कि देश इस अंतर को कम कर रहा है.
अगर कीमत सही तरीके से तय की जाए तो सैटेलाइट ब्रॉडबैंड इस अंतर को कम करने में मददगार साबित हो सकता है.
साथ ही इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) में भी सहायक हो सकता है, ये एक ऐसा नेटवर्क है जो कि रोज़मर्रा की चीज़ों को इंटरनेट से जोड़ता है और उन्हें एक-दूसरे से बात करने की सुविधा भी मुहैया कराता है.
तकनीकी विश्लेषक प्रशांतो के रॉय ने को बताया था कि भारतीय ऑपरेटरों के साथ कीमतों की इस जंग को कोई नहीं रोक सकता है. मस्क के पास खूब पैसा है. वह भारत के घरेलू बाजार में अपने पैर जमाने के लिए कुछ इलाक़ों में मुफ्त सेवाएं भी दे सकते हैं.
स्टारलिंक ने पहले से ही कीनिया और दक्षिण अफ़्रीका में कीमतों को कम कर दिया है.
हालांकि ये आसान नहीं हो सकता है. 2023 की रिपोर्ट में ईवाई पार्थेनन ने ज़िक्र किया है कि स्टारलिंक की ज़्यादा लागत सरकारी सब्सिडी के बिना मुकाबले को मुश्किल बना सकती है, क्योंकि स्टारलिंक की लागत दिग्गज भारतीय ब्रॉडबैंड कंपनियों की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक है.
ग्लोबल कवरेज देने के लिए एमईओ सैटेलाइट की तुलना में बहुत ज़्यादा एलीओ सैटेलाइट (जिसका इस्तेमाल स्टारलिंक के लिए होता है) की ज़रूरत होती है, जो लॉन्च और रखरखाव की लागत को बढ़ाते हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां कर सकते हैं. आप हमें , , और पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)