हनी सिंह के नए गाने में भोजपुरी की अश्लीलता को ही जगह क्यों मिली?
बात 22 फरवरी 2025 की है. चंद भोजपुरी भाषी अपने गौरव के दिन को याद कर रहे थे. सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखकर सेलिब्रेट कर रहे थे, इस ख़ास दिन को.
22 फरवरी भोजपुरी के लिए ऐतिहासिक दिन था. साल 1963 में इसी दिन भोजपुरी की पहली फ़िल्म 'हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो' रिलीज हुई थी.
इस फ़िल्म ने सिर्फ़ भोजपुरी के लिए सिनेमा संसार में स्वतंत्र अस्तित्व और पहचान के साथ आगे बढ़ने के लिए संभावनाओं के द्वार नहीं खोले थे, बल्कि इस फ़िल्म के माध्यम से गीतकार शैलेंद्र और संगीतकार चित्रगुप्त की जोड़ी ने भोजपुरी गीत-संगीत की दुनिया की धारा बदल दी थी.
लेकिन, इस साल 22 फरवरी को भोजपुरी भाषियों का एक बड़ा हिस्सा दूसरे क़िस्म से सेलिब्रेट कर रहा था. मशहूर रैपर हनी सिंह का नया वीडियो सॉन्ग उस दिन आया, 'मैनिएक'.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए

स्वाभाविक है, हनी सिंह का नाम है, तो चहुंओर शोर-शराबा भी हुआ. इस बार हनी सिंह ने इस गीत में भोजपुरी का भी छौंका लगाया है. गीत में एक अंतरा डालकर. उस अंतरे के बोल पर विवाद हो रहा है.
इस अंतरे में यह ज़ाहिर होता है कि ज़ोर ज़बर्दस्ती की बात कही जा रही है, लगभग बलात्कार जैसी स्थिति की तुलना हो सकती है.
हनी सिंह के वीडियो में इस गीत को गाया है, रागिनी विश्वकर्मा ने. रागिनी विश्वकर्मा पिछले कुछ सालों से सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों पर गायन कर लोकप्रिय हुई हैं.
हालाँकि भोजपुरी गीतों में यह कोई नई बात नहीं. भोजपुरी के सो कॉल्ड स्टार कई सालों से स्त्री के हर अंग के सौंदर्य का वर्णन करने के दायरे से निकल, उसे नोचने के अंदाज़ में गा रहे हैं. सिर्फ़ रिकार्ड में ही नहीं, मंचों से भी.
सिर्फ़ शब्दों या गीतों के बोल के ज़रिए नहीं, बल्कि अब इन भावों को व्यक्त करने के लिए पुरुष कलाकार स्त्री कलाकारों को भी मंच पर साथ लेकर चलते हैं या समूह में लड़कियों को रखते हैं, ताकि वह बता भी सके कि जो गा रहे हैं, उसके मायने क्या हैं.
इस दृष्टि से देखें, तो भोजपुरी गायकी के लिए यह कोई नई बात नहीं.
बात नई यह है कि अब तक इसे भोजपुरी के बड़े कलाकार कर रहे थे, लेकिन अब हनी सिंह ने इसे और विस्तार दे दिया. ज़्यादा पैसे ख़र्च कर. ज़्यादा भव्य तरीक़े से.
कुछ लोगों को आश्चर्य भी हुआ कि हनी सिंह जैसे बड़े नाम ने भोजपुरी के सबसे निचले स्तर पर चालू कल्चर को ही क्यों अपना लिया? इसमें नयापन क्या रहा?
यह काम तो भोजपुरी के सभी बड़े सो कॉल्ड स्टार या बड़े कलाकार कर रहे हैं.
हनी सिंह ने भोजपुरी को ख़ुद के गाने से जोड़ा भी, तो इतने हल्के तरीक़े से और नकलची की तरह क्यों?
जो हनी सिंह के पक्षधर हैं, उनके पास अपने तर्क हैं. वो यह कि भोजपुरी में ऐसे ही गीत होते हैं. हनी सिंह ने क्या ग़लत किया!
यह तर्क भी दिया जा रहा है कि हनी सिंह ने एक गुमनाम या कम चर्चित गायिका को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बना दिया.
भोजपुरी को इतने बड़े कैनवास पर, लोकप्रिय किया, रैप में लाया. ये सब क्या कम है?
भोजपुरी मास कल्चर का हिस्सा तो है लेकिन...ये सब चलताऊ लेकिन हालिया वर्षों के सबसे लोकप्रिय तर्क हैं. हर बार भोजपुरी के ऐसे काम के साथ चस्पां किया जानेवाला तर्क.
हक़ीक़त इतना सपाट नहीं. भोजपुरी मास कल्चर न पहचान का मोहताज है, न लोकप्रियता में कोई कमी है. भोजपुरी में औसतन हर सप्ताह ऐसे गाने आते हैं, जो एक ही दिन में लाखों के व्यूज बटोरते हैं.
भोजपुरी में न रैप पहली बार हुआ है और ना ही भोजपुरी संगीत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुँचने के सामने संकट या चुनौतियाँ हैं.
कोविड काल में डॉ. सागर ने 'का बा...' शीर्षक से गीत लिखा, जिसे अनुभव सिन्हा ने मनोज वाजपेयी पर फ़िल्माया. मनोज वाजपेयी ने ही गाया भी.
वह रैप के रूप में ही आया और हाल के वर्षों में भोजपुरी का कल्ट गीत बना, जिस पर तब से अब तक न जाने कितने गीत रचे या गाए गए.
भोजपुरी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की भी चुनौती नहीं, क्योंकि भोजपुरी गायकी का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलाव का इतिहास पुराना रहा है.

गिरमिटिया कल्चर के गीत भोजपुरी बेस के साथ ही हैं.
सुंदर पोपो से लेकर राजमोहन और रागा डी मेन्नू तक ऐसे कलाकारों की एक लंबी और समृद्ध परंपरा भोजपुरी गायन के पास है, जो दशकों से दुनिया के स्तर पर भोजपुरी को गा और फैला रहे हैं.
सुंदर पोपो का गाया गाना, 'फुलौरी बिना चटनी कइसे बनी...' 70 और 80 के दशक में दुनिया भर में फैला था. इस गीत को फिर से गाकर भारत के दो कलाकार कंचन और बावला ने दुनिया में लोकप्रियता हासिल की थी.
भोजपुरी गीतों की धमक हुआ करती थीभोजपुरी के सामने यह संकट भी नहीं कि वह बॉलीवुड से हिंदी सिनेमा जगत से कैसे जुड़ जाए, क्योंकि इसका भी एक समृद्ध इतिहास रहा है.
1948 में आई फिल्म 'नदिया के पार' जिसमें दिलीप कुमार और कामिनी कौशल ने अभिनय किया था, भोजपुरी गाने थे. उन गीतों को लिखा था, भोजपुरी के विलक्षण गीतकार और कवि मोती बीए ने.
इसके बाद 'मैंने प्यार किया', 'हम आपके हैं कौन', 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' जैसे अनेक फ़िल्मों में भोजपुरी गाने आए. भोजपुरी में पंडित रविशंकर ने संगीत दिया. शैलेंद्र जैसे महान कवि और गीतकार ने भोजपुरी के गीत लिखे.
भोजपुरी के सामने सबसे बड़ी चुनौती मास कल्चर से ही पार पाने की है. पिछले कुछ दशकों से भोजपुरी की लोकप्रियता पहले की तुलना में ज़्यादा तेज़ी से ग़ैर भोजपुरी भाषियों के बीच बढ़ी है. लेकिन उतनी ही तेज़ी से भोजपुरी भाषियों का क्लास इससे कटा भी है.
'मास' के बीच जाने की होड़ में ही भोजपुरी गायकी ने रास्ता बदला. इन गानों का अधिकतर हिस्सा तेज़ी से स्त्रियों के तन के इर्द-गिर्द चला गया. स्त्री देह के केंद्र में आते ही भोजपुरी गीतों के बाज़ार ने इतना विस्तार लिया कि ग़ैर भोजपुरी भाषियों का एक बड़ा समूह इससे तेज़ी से जुड़ने लगा.
श्रोता-दर्शक के रूप में भी और कलाकार रूप में भी. मैथिली, अवधी, मगही से लेकर हिंदी के कलाकार भी भोजपुरी में अपनी संभावना तलाशने लगे. अचानक कलाकारों की बाढ़ जैसी आ गई भोजपुरी में. छोटे शहर में साउंड रिकार्डिंग स्टूडियो खुलने लगे.
हर पंचायत में एक गायक या गायिका बनने लगे. गायक या गायिका बनने का आसान फ़ॉर्मूला भोजपुरी के हाथों लगा. इरोटिक गीत का चयन करना, उसे गाना, उसे उसी तरह फ़िल्माना भी. अगर भोजपुरी के इस ट्रेंड को देखें, तो हनी सिंह भी इसी परंपरा से जुड़ते हैं.
देश-दुनिया में नाम कमाने के बाद यह हनी सिंह का नवाचार है, नया प्रयोग है या एक पॉपुलर प्रयोग का अनुयायी बनना, यह तय करना मुश्किल है.
हनी सिंह का प्रयोग इसलिए भी नया नहीं माना जाएगा, क्योंकि इसके पहले भी दो पंजाबी कलाकार भोजपुरी में ऐसा ही कुछ कर चुके हैं.
इस बारे में भोजपुरी फिल्म निर्देशक नितिन चंद्रा कहते हैं, "इसमें हनी सिंह को ही क्यों दोष दें. इसके पहले बादशाह भी ऐसा प्रयोग कर चुके हैं. प्रियंका चोपड़ा जब 'बम बम बोल रहा है काशी' फिल्म बनाई, तो उसके ट्रेलर में ही ऐसा ही गीत आया."
नितिन चंद्रा कहते हैं, "हनी सिंह का भोजपुरी के साथ भद्दा प्रयोग दुखद नहीं है. दुखद है कि जो अच्छे लोग हैं, प्रभावी लोग हैं, जिनके बोलने से असर पड़ सकता है, वे कुछ बोलते नहीं. प्रियंका चोपड़ा या किसी में यह साहस है कि वे मराठी में या दूसरी भाषा के साथ इस तरह से खेल सकें."
नितिन चंद्रा किसी का नाम नहीं लेते. लेकिन इसे डिकोड करें तो यह साफ़ पता चलेगा कि सिनेमा और संगीत से जुड़े भोजपुरी इलाक़े के जो नामचीन लोग रहे, उन्होंने अपनी भाषा और संस्कृति के सिनेमा और गायन को छोड़ दिया. उस वैक्यूम को भोजपुरी के कथित बड़े कलाकार और दूसरे भाषा के बड़े सिनेमाकार, गायकों ने भना शुरू कर दिया.
एक दौर ऐसा भी था, जब भोजपुरी के लिए लता मंगेशकर, आशा भोंसले, मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, मुकेश, महेंद्र कपूर जैसे सभी शीर्ष कलाकार भोजपुरी गा रहे थे.
पंडित रविशंकर जैसे शीर्षस्थ कलाकार भोजपुरी के लिए संगीत रच रहे थे. शैलेंद्र से लेकर मजरूह सुल्तानपुरी जैसे कवि भोजपुरी गीत लिख रहे थे.
यह सब इसलिए संभव हो रहा था, क्योंकि भोजपुरी भाषा क्षेत्र से निकले डॉ राजेंद्र प्रसाद और जगजीवन राम जैसे नेता अपनी भाषा की चिंता कर इसके सौंदर्य को निखारने के लिए प्रयास कर रहे थे.
चित्रगुप्त और एसएन त्रिपाठी जैसे संगीतकार, हिंदी में अपनी विशिष्ट पहचान बना लेने के बावजूद अपनी भाषा भोजपुरी के लिए लगातार काम कर रहे थे.
बाद में प्रकाश झा, मनोज वाजपेयी और पकंज त्रिपाठी का दौर आया
इन भोजपुरी कलाकारों के रहते हुए भी भाषा और उसके प्रयोग का स्तर नहीं बदला. कई कलाकारों के लिए भोजपुरी में काम करना, करियर को सीमित करने जैसा लगा.
इन सबका एक नतीजा ये भी दिखने लगा कि भोजपुरी में अचानक बिना अभिनय कला जानने वाले सुपर स्टार अभिनेता बनते चले गए, आटो ट्यून पर गाने वाले गायकों की लोकप्रियता बढ़ती गई.
इस बीच स्त्री के देह को केंद्र में रखकर गाने और फ़िल्म दोनों बनने लगे.
इस तरह से देखें तो हनी सिंह फिर से भोजपुरी को फिर चोली वाले गानों की तरफ़ लाए हैं.
एक दौर था, जब चोली ही केंद्र में थी. लगाई दिहीं चोलिया के हुकवा राजा जी जैसे गीत पहले ही आ चुके हैं. लेकिन बीच में कुछ सालों से वह नाभी और लहंगा आदि पर केंद्रित हो गया था. हनी सिंह का नयापन बस इतना ही है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां कर सकते हैं. आप हमें , , और पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)