प्रहलाद कक्कड़: शाहरुख़ के बजाय आमिर पर दांव और 'ये दिल मांगे मोर'

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Getty Images प्रहलाद कक्कड़ का जन्म इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ था.

सन 1971 में तीन सौ रुपए और बहुत सारे सपनों के साथ प्रहलाद कक्कड़ बॉम्बे सेंट्रल स्टेशन पर उतरे थे. अपने शुरुआती संघर्ष के दिनों में वो रेलवे स्टेशनों की सीटों और अपने दोस्तों के घरों के सोफ़ों पर सोए थे.

मशहूर फ़िल्म निर्देशक श्याम बेनेगल लिखते हैं, "जब प्रहलाद किशोर ही थे, उनके भविष्य के बारे में परेशान उनकी माँ ने विज्ञापन बनाने वाले मशहूर डायरेक्टर जोग चटर्जी से उन्हें अपने संरक्षण में लेने के लिए कहा था. उन्होंने प्रहलाद को ले तो लिया लेकिन कोई ख़ास काम नहीं दिया. विज्ञापन की दुनिया में इस भूमिका को 'गैफ़र' कहा जाता था जिसका मतलब था किसी को छोटे-मोटे काम के लिए इधर उधर भेजना. उनके पास प्रहलाद के लिए दिल्ली में कुछ ख़ास काम नहीं था इसलिए उन्होंने उन्हें मुंबई भेज दिया."

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BBC HarperCollins India प्रहलाद कक्कड़ की आत्मकथा 'ऐडमैन मैडमैन'

उन्होंने कभी उनको दिए किसी काम के लिए मना नहीं किया. काम के प्रति उनका उत्साह देखते ही बनता था.

बेनेगल ने लिखा है, "उनके पंख निकलने में बहुत देर नहीं हुई और जल्द ही उन्होंने अपने-आपको विज्ञापन की दुनिया में स्थापित कर लिया."

कुछ समय पहले प्रकाशित अपनी आत्मकथा 'ऐडमैन मैडमैन' में उन्होंने अपने जीवन से संबंधित कई अनुभवों को साझा किया है.

प्रहलाद कक्कड़ का जन्म 24 मार्च, 1951 को तब के इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ था. उनके पिता लेफ़्टिनेंट कर्नल अमीर चंद कक्कड़ पाकिस्तान के डेरा इस्माइल ख़ाँ के रहने वाले थे जबकि उनकी माँ शशिकला कक्कड़ बर्मी और मराठी मूल की थीं.

प्ले स्कूल से निकाले गए Getty Images भारतीय विज्ञापन फ़िल्म निर्देशक के रूप में प्रहलाद कक्कड़ की अलग पहचान है.

उनके बचपन से ही उनके पिता और माँ अलग-अलग रहने लगे थे, लेकिन उनके पिता ने शुरू में ही उनके मन से डर की भावना निकाल दी थी.

उन्होंने उन्हें घुड़सवारी सिखाई, उन्होंने घुड़सवारी न सीखने के लिए कई बहाने और नखरे दिखाए लेकिन उनके पिता ने उनकी एक न सुनी और उन्हें घुड़सवारी सिखा कर ही माने.

उनकी माँ को पढ़ने का बहुत शौक था, उनसे प्रहलाद को पढ़ने का शौक मिला. अपने बचपन में प्रहलाद का दाखिला दिल्ली में लोधी गार्डन के पास एक प्ले स्कूल में करा दिया गया.

अपनी आत्मकथा में उन्होंने एक वाकये का ज़िक्र किया जब प्ले स्कूल में उनके साथ पढ़ रही स्कूल की मालकिन की बच्ची से उनके एक वार्तालाप को स्कूल प्रशासन ने बेहद आपत्तिजनक मानते हुए उन्हें स्कूल से निकाल दिया.

हालांकि कक्कड़ लिखते हैं कि इस मामले में उनसे बात तक नहीं की गई.

लड़की से नज़दीकी Getty Images कई बेहतरीन टीवी विज्ञापनों को उनके काम के लिए जाना जाता है.

प्ले स्कूल की इस घटना के बाद प्रहलाद का देहरादून के सेंट टॉमस स्कूल में दाख़िला करा दिया गया. वहाँ उन्होंने एथलेटिक्स और बॉक्सिंग जैसे खेलों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. वहीं उनका एथलेटिक्स गर्ल्स टीम की कप्तान नलिनी के प्रति आकर्षण बढ़ा.

प्रहलाद लिखते हैं, "मैंने उसे अपने घर बुलाया, अपनी बग़ल में बैठाकर उसका हाथ पकड़ा. फिर मैंने उसका चुंबन लिया. हम दोनों ही इस मामले में अनाड़ी थे. थोड़ी देर बाद हम अलग होकर दूर जा बैठे और ये दिखाने लगे जैसे कुछ हुआ ही न हो."

"फिर मैं उसे अपनी साइकिल पर आगे बिठाकर उसके घर छोड़ने गया. घर पर उसके पिता पोर्च में खड़े उसका इंतज़ार कर रहे थे. मैंने उनकी गरजदार आवाज़ सुनी. मैं अपनी साइकिल पर बैठा और बेतहाशा पैडल चलाता हुआ वहाँ से भाग निकला."

जब प्रहलाद सिर्फ़ नौ साल के थे तो उनके पिता का निधन हो गया. उन्होंने अपनी माँ को दोबारा विवाह नहीं करने दिया.

वे अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, "मुझे अपनी माँ का सुंदर होना पसंद नहीं था. मैंने उनका अपने स्कूल आना बंद करवा दिया था जहाँ मेरे दोस्तों की नज़र उनके ख़ूबसूरत चेहरे पर जाती थी. मैं समझता हूँ कि उन्होंने मेरी वजह से ही दोबारा शादी नहीं की."

श्याम बेनेगल के सहायक बने Getty Images मशहूर फ़िल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने प्रहलाद कक्कड़ को अपना सहायक बनाया.

देहरादून के बाद प्रहलाद का दाखिला करनाल के पास कुंजपुरा के सैनिक स्कूल में कराया गया. प्रहलाद सेना में जाना चाहते थे लेकिन उनकी आँखें कमज़ोर थीं जिसकी वजह से उनकी ये महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हो सकी.

दसवीं में ख़राब अंक आने के कारण उनका दाखिला किसी अच्छे कालेज में नहीं हो सका. किसी तरह उनका दाख़िला बड़ौदा के एमएस विश्वविद्यालय में हुआ, वहाँ से वो पुणे के फ़र्ग्यूसन कालेज में पढ़ने गए जहाँ उन्होंने सैन्य विज्ञान में डिग्री ली.

बंबई पहुँचने के बाद श्याम बेनेगल ने उन्हें 350 रुपए के वेतन पर अपने साथ रख लिया. उन्होंने बेनेगल की कई विज्ञापन फ़िल्मों में उनकी मदद की.

जब उन्होंने अंकुर, मंथन और भूमिका बनाई तो प्रहलाद कक्कड़ उनके सहायक थे. प्रहलाद ने श्याम बेनेगल से बहुत कुछ सीखा.

उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा, "आजकल फ़िल्म निर्माण को कई हिस्सों में बाँट दिया गया है. कोई सहायक निर्देशक है, तो कोई प्रोडक्शन मैनेजर है. श्याम बेनेगल इसके बिल्कुल उलट थे."

"उनका मानना था कि फ़िल्म निर्माण से जुड़ा हर काम आपका है, चाहे कबूतरों ने सेट पर बीट कर दी हो या किसी की कान की बाली खो गई हो या खाना समय पर नहीं आया है या हीरोइन कुछ नख़रे दिखा रही है, आप इन सबसे अपने-आप को अलग नहीं कर सकते."

सन 1978 में प्रहलाद ने अपनी ऐड कंपनी जेनेसिस शुरू की. इसके बाद उन्होंने लोकप्रिय विज्ञापनों की झड़ी लगा दी जिन्होंने उन्हें भारत के शीर्ष 'ऐडमैन' की श्रेणी में ला खड़ा किया.

'प्रॉमिस' टूथपेस्ट और 'मैगी नूडल' के विज्ञापन Getty Images टूथपेस्ट और सॉफ़्ट ड्रिंक्स के लिए प्रहलाद कक्कड़ के बनाए विज्ञापनों ने उस समय धूम मचा दी थी.

उनके सबसे पहले लोकप्रिय होने वाले विज्ञापनों में 'प्रॉमिस' टूथपेस्ट का विज्ञापन था. इसके लिए प्रहलाद ने डॉ. माया अलघ को चुना.

प्रहलाद लिखते हैं, "माया ने ही टैगलाइन का अनुवाद किया. ओफ़्फ़ो एक और नया टूथपेस्ट. ये जुमला पूरे भारत में छा गया. माया अलघ हमेशा के लिए 'ओफ़्फ़ो प्रॉमिस लेडी' बन गईं."

"ब्रैंड ने यकायक टूथपेस्ट के बाज़ार में 4 फ़ीसदी की जगह बना ली. ये उस ज़माने में बहुत बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि उनका मुक़ाबला 'कोलगेट' और बिनाका जैसे ब्रैंडों से था."

"इन ब्रैंडों ने बाद में सफ़ाई दी कि वो भी अपने टूथपेस्ट में लौंग के तेल का इस्तेमाल करते हैं लेकिन माना यही गया कि सिर्फ़ 'प्रॉमिस' ही लौंग के तेल का इस्तेमाल करता है."

इसके बाद मैगी के विज्ञापन ने सबका ध्यान अपनी तरफ़ खींचा.

प्रहलाद लिखते हैं, "भारत में अधिकतर लोगों को दाल-चावल, साँभर-चावल, मछली-चावल, राजमा-चावल खाने की आदत थी इसलिए 'नेस्ले' के नए नूडल उत्पाद को लॉन्च करना एक बहुत बड़ा जोखिम का काम था लेकिन 'नेस्ले' इस मुहिम में ख़ासा पैसा लगाने के लिए तैयार था."

"टार्गेट ऑडिएंस को बहुत सावधानी से चुना गया. थकी हुई घरेलू महिलाएं और पाँच से दस साल के बीच के भूखे बच्चे जो कि भी अभी स्कूल या खेल-कूद कर घर लौटे हैं. उन्हें खाने के लिए कुछ चाहिए, तुरंत."

"इस शूट में एक बच्चे के पास एक छोटा बालों वाला कुत्ता था जिसे वह किसी कीमत पर छोड़ने के लिए तैयार नहीं था इसलिए हमने उसे भी विज्ञापन में शामिल किया. इसके बाद की चीज़ें इतिहास है."

इसके लिए हमने लुई बैंक्स से जिंगल तैयार करवाया. मैगी नूडल आज भी उसी जिंगल का इस्तेमाल करता है.

वैसे तो प्रहलाद शुरू से ही सॉफ़्ट ड्रिंक के विज्ञापन बनाते रहे हैं. गोल्ड स्पॉट के विज्ञापन में उन्होंने रंगमंच के कलाकार जयंत कृपलानी को मौका दिया था लेकिन जिस सॉफ़्ट ड्रिंक एड ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया वो पेप्सी का विज्ञापन था.

ये एक अंतरराष्ट्रीय ऐड था जिसमें माइकल फ़ॉक्स को शूट किया गया था, उनको उसे भारतीय दर्शकों के लिए बनाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी.

प्रहलाद लिखते हैं, "हमारी समस्या ये थी कि अगर हम अच्छा ऐड बनाते हैं तो लोग कहेंगे कि हम नकलची हैं. अगर हम इसे बुरा बनाते हैं तो लोगों की प्रतिक्रिया होगी कि हम ढंग से नकल भी नहीं कर पाए. बहरहाल, हमारे लिए चुनौती थी कि हम पूरी तरह से अमेरिकी विचार को भारतीय रंग में रंगें."

"तभी हमें ये भी लगा कि नज़रिए की दृष्टि से भारत में अगर कोई शहर अमेरिका के करीब है तो वो दिल्ली नहीं, मुंबई है. अगर ये विज्ञापन मुंबई में हिट हो जाता है तो पूरे भारत में चल पड़ेगा, हमने अपनी तरह से स्टोरी-लाइन का भारतीयकरण किया."

"अब अगली चुनौती थी कि इस विज्ञापन के शूट के लिए किसको चुना जाए."

आमिर और ऐश्वर्या को चुना Getty Images ऐश्वर्या राय को पहला ब्रेक प्रहलाद कक्कड़ के विज्ञापन में मिला.

माइकल फ़ॉक्स का मूल विज्ञापन 90 सेकेंड का था. पेप्सी चाहता था कि भारत में इस विज्ञापन की अवधि सिर्फ़ 45 सेकेंड हो.

और इसके लिए हो सके तो शाहरुख़ को लिया जाए जो उस ज़माने में उभरते हुए कलाकार थे, लेकिन प्रहलाद की टीम का मानना था कि इसके लिए आमिर ज़्यादा उपयुक्त होंगे क्योंकि उन दिनों उनकी फ़िल्म 'क़यामत से क़यामत तक' युवाओं के दिल में घर कर चुकी थी.

पेप्सी इस चुनाव से बहुत खुश नहीं हुई क्योंकि वो पहले ही शाहरुख़ से बात कर चुके थे और आमिर इसे करने के लिए बहुत अधिक उत्सुक भी नहीं थे क्योंकि उन दिनों फ़िल्म कलाकारों का एड फ़िल्म में काम करने को बहुत अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता था और दूसरे वो इसके लिए बहुत पैसे माँग रहे थे.

प्रहलाद लिखते हैं, "आख़िर में हमने माइकल फ़ॉक्स की फ़िल्म दिखाकर आमिर को काम करने के लिए मना तो लिया लेकिन तब भी वो अपनी फ़ीस कम करने के लिए तैयार नहीं हुए. हमने जब पेप्सी को मनाया तो उन्होंने इस शूट के लिए अपना बजट बढ़ा दिया."

"अब समस्या थी कि आमिर के साथ किस महिला को चुना जाए. एक दिन एक कुर्ती, बदरंग जीन्स और चप्पल पहने हरे आँखों वाली एक लड़की जेनेसिस के दफ़्तर में आई. उसके हाथ में एक झोला था. मेरी असिस्टेंट मोनिया सहगल ने कहा कि हम जिस लड़की की तलाश कर रहे हैं, वो हमें मिल गई है."

वे ऐडमैन मैडमैन में लिखते हैं, "मुझे उस लड़की की जिस चीज़ ने सबसे अधिक आकर्षित किया वो थी उसकी आँखें. मैंने उससे अपने बालों को ढीला करने के लिए कहा. जैसे ही उसने अपने बाल ढीले किए, मैंने कहा, 'नॉट बैड.' फिर भी मेरा मन पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हुआ."

"मैंने मोनिया से कहा कि इसके बाल गीले करके बहुत कम मेक-अप के साथ इसकी तस्वीर लो. कैमरे में गज़ब की तस्वीर आई. उस लड़की का नाम था ऐश्वर्या राय."

उन्होंने मेक-अप मैन विद्याधर से ऐश्वर्या के बारे में कहा था, 'इनको भगवान ने बहुत फुर्सत से बनाया है इसलिए इन पर बहुत ज़्यादा काम करने के बारे में सोचना भी मत.'

प्रुडेंट माउथवाश के ऐड में डॉक्टर का रोल कर रहे जलाल आग़ा पर ऐश्वर्या की सुंदरता का इतना असर हुआ कि बात-बात पर 'नॉन-वेज' जोक सुनाने वाला वो शख़्स पूरी तरह ख़ामोश हो गया.

पेप्सी के विज्ञापन की शूटिंग के बारे में प्रहलाद लिखते हैं, "शूटिंग शुरू होते ही ऐश्वर्या ने ये कहते हुए अपने हाथ खड़े कर दिए कि उनसे ये नहीं हो पाएगा. मैंने उन्हें कोने में ले जाकर शांत किया और कहा, कल्पना कीजिए कि आप स्मार्ट लड़कों से भरे कमरे में खड़ी हैं."

"आपको बस इतना कहना है, 'हाय, आई एम संजना, गॉट अनअदर पेप्सी ?' ये वाक्य आपको चुनौती भरे लहजे में कहना है ताकि उन लड़कों में आपके लिए पेप्सी लाने की होड़ लग जाए. इस ऐड में अपनी चार सेकेंड की भूमिका के बाद ऐश्वर्या राय लीजेंड बन गईं."

उन्होंने लिखा कि इस ऐड को देखने के बाद हज़ारों माता-पिताओं ने अपनी बेटी का नाम संजना रखा.

पेप्सी के ऐड की शूटिंग के दौरान ही मुंबई में इतिहास के सबसे बुरे सांप्रदायिक दंगे शुरू हो गए. ऐसे में पेप्सी की विभा ऋषि ने स्थिति सामान्य होने तक पूरी टीम के होटल में रुकने का इंतज़ाम किया.

कोका कोला को चुनौती Getty Images प्रहलाद कक्कड़ के बनाए विज्ञापन ने कोका कोला के प्रचार को पीछे छोड़ दिया.

सन 1996 में जब भारत में वर्ल्ड कप क्रिकेट का आयोजन किया गया तो पेप्सी की लाख कोशिशों के बावजूद उसके मुख्य प्रतिद्वंद्वी कोका-कोला को प्रतियोगिता का मुख्य स्पॉन्सर बनाया गया.

पेप्सी की बैठक में इस बात पर बहस हो रही थी कि कोक के ऑफ़िशियल स्पॉन्सर बनने का किस तरह सामना किया जाए, तभी प्रहलाद की जूनियर साथी अनुजा चौहान की आवाज़ गूंजी, 'हमें ऑफ़िशियल स्पॉन्सर बनने की क्या ज़रूरत है?'

अनुजा से पहले ही कह दिया गया था कि इस मीटिंग में उनका शामिल होना ही बड़ी बात है. यहाँ उनको सुनने के लिए नहीं बुलाया गया है.

प्रहलाद कक्कड़ लिखते हैं, "लेकिन अनुजा नहीं मानीं. उन्होंने कहा कोक वर्ल्ड कप का ऑफ़िशियल प्रायोजक हो सकता है तो पेप्सी अन-अफ़िशियल प्रायोजक क्यों नहीं ? करीब 50 हज़ार लोग स्टेडियम में मैच देख रहे होंगे लेकिन लाखों लाख ऐसे लोग होंगे जो स्टेडियम के बाहर होंगे. हम उनको क्यों नहीं टार्गेट करते?"

"पेप्सी की विभा ऋषि ने एक सेंकेंड से भी कम समय में फ़ैसला लिया, हम इस आइडिया पर काम करेंगे. वहीं पर मशहूर टैग लाइन का जन्म हुआ, 'देअर इज़ नथिंग ऑफ़िशियल अबाउट इट.' पेप्सी का ये प्रचार इतना हिट हुआ कि उसने कोक के प्रचार को कहीं पीछे छोड़ दिया.

'ये दिल माँगे मोर' Getty Images

इसके कुछ दिनों बाद पेप्सी की अंतरराष्ट्रीय यूनिट ने एक नया अभियान चलाया जिसकी टॉप लाइन थी 'आस्क फ़ॉर मोर.'

प्रहलाद के नेतृत्व में इसकी तर्ज़ पर भारत में भी एक अभियान चलाया गया जिसको नाम दिया गया, 'ये दिल माँगे मोर.'

प्रहलाद लिखते हैं, "इस अभियान के लिए हमने शाहिद कपूर को चुना. शुरू में पेप्सी इसके लिए राज़ी नहीं हुआ. उनका तर्क था कि शाहिद कुछ ज़्यादा ही ख़ूबसूरत हैं. उनमें मर्दाना झलक नहीं के बराबर है."

"लेकिन हम पेप्सी को शाहिद कपूर के लिए मनाने में कामयाब हो गए. 'ये दिल माँगे मोर' एक तरह का ऱाष्ट्रीय जुमला बन गया. सन 1999 में हुई कारगिल की लड़ाई में भी इसका इस्तेमाल हुआ."

"जब एक पत्रकार ने परमवीर चक्र विजेता विक्रम बत्रा को उनकी जीत पर बधाई दी तो उनका जवाब था, 'ये दिल माँगे मोर.'

स्कूबा डाइविंग स्कूल से रेस्तराँ तक Getty Images प्रहलाद कक्कड़ ने पहले पृथ्वी थिएटर में जेनिफ़र कपूर के साथ मिलकर एक रेस्तराँ खोला था. (सांकेतिक तस्वीर)

अपने करीब 50 साल के करियर में उन्होंने बहुत कुछ किया. उन्होंने लक्षद्वीप मे स्कूबा डाइविंग स्कूल शुरू किया. उन्होंने वाइन और सिगार बनाने से लेकर रेस्तरां खोलने के अपने सारे शौक पूरे किए.

उन्होंने पहले पृथ्वी थिएटर में जेनिफ़र कपूर के साथ मिलकर एक रेस्तराँ खोला. बाद में उन्होंने एक पंजाबी खाने का एक और रेस्तराँ खोला जिसके नाम को लेकर काफ़ी विवाद भी हुआ. रेस्तराँ का नाम रखा गया, पापा पैंचो.

इस नाम को सही ठहराते हुए उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा, 'पैंचो अब एक तरह का प्यार का संबोधन बन गया है. हम मुंबई में एक ऐसी जगह बनाना चाह रहे थे जहाँ मुंबई में रहने वाले होमसिक पंजाबी 'मम्मी दे हाथ दा खाना' का आनंद ले सकें."

"हमारे पास पैंपलेट छपवाने के लिए पैसे नहीं थे. हमने एक हांडी भर कर उड़द की दाल बनवाई और उसे नमूने के तौर पर एक छोटे कुल्हड़ में भरकर इस संदेश के साथ पड़ोस के 400 घरों में मुफ़्त बाँटा, 'एक ढाबे की जान उसकी दाल है. अगर आपको हमारी दाल पसंद आएगी तो आपको यहाँ का सब कुछ पसंद आएगा."

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