वी. शांताराम का वो प्रभात स्टूडियो जहां से देव आनंद और गुरु दत्त ने करियर शुरू किया

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FTII प्रभात स्टूडियो एक बड़ा हिस्सा एफ़टीआईआई (फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया) का कैंपस है

बात भले ही पुरानी है, लेकिन आपको हैरत होगी कि 1930 से भी पहले भारतीय सिनेमा में हॉलीवुड जैसी स्टूडियो संस्कृति की नींव रखी जा चुकी थी.

यहां सिनेमा का एक संगठित और पेशेवर रूप था, जिसमें तकनीशियन, संगीतकार, गीतकार, पटकथा लेखक और यहां तक कि अभिनेता-अभिनेत्रियों तक को वेतन पर रखा जाता था.

आज जिस ऐतिहासिक स्टूडियो की दास्तान हम आपके सामने रख रहे हैं, उसका नाम है प्रभात फ़िल्म कंपनी.

हालांकि, इसे अक्सर इस रूप में याद किया जाता है कि फ़िल्मकार वी. शांताराम के साथ यहीं से हिंदी सिनेमा के दो दिग्गजों देव आनंद और गुरु दत्त ने अपने करियर की शुरुआत की, लेकिन प्रभात फ़िल्म कंपनी की विरासत इससे कहीं ज़्यादा गहरी है.

ज़रा कल्पना कीजिए उस दौर की, जब भारत में फ़िल्मों का जन्म हो रहा था, जब किसी ने पहली बार कैमरा उठाया, जब पहली बार कोई कहानी पर्दे पर जीवंत हुई, और जब सपनों को सिल्वर स्क्रीन पर साकार करने की ललक जागी.

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BBC Getty Images 1913 में भारत की पहली फ़ीचर फ़िल्म राजा हरिश्चंद्र दादा साहब फाल्के ने बनाई थी BBC

इस सफ़र की शुरुआत करने वालों में दो नाम सबसे अहम थे, दादा साहब फाल्के और बाबूराव पेंटर. ये दोनों ही मराठी सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश से आए थे.

1913 में भारत की पहली फ़ीचर फ़िल्म राजा हरिश्चंद्र बनाकर फाल्के ने भारतीय सिनेमा की पहली ईंट रखी, तो बेहतरीन चित्रकार और तकनीशियन बाबूराव पेंटर ने फाल्के की फिल्म से प्रेरणा लेकर सैरंध्री और सिंहगढ़ जैसी फ़िल्मों में भव्य सेट, उम्दा लाइटिंग और खूबसूरत दृश्यों की परंपरा शुरू की और भारतीय मूक सिनेमा का सौंदर्यशास्त्र गढ़ा.

इन दोनों हस्तियों ने जो बीज बोए, उन्हीं से आगे चलकर प्रभात फ़िल्म कंपनी जैसी प्रतिष्ठित स्टूडियो संस्कृति फली-फूली.

Getty Images सिनेमा की दुनिया में वी. शांताराम (बाएं से तीसरे कुर्सी पर बैठे हुए) को वन-मैन आर्मी कहा जाता है

फाल्के के पास उत्तराधिकारियों की कोई श्रृंखला नहीं थी, जबकि पेंटर ने उस दौर के कुछ प्रतिष्ठित नामों को ट्रेनिंग दी थी. बाबूराव पेंटर के चार शिष्यों ने उनकी महाराष्ट्र फ़िल्म कंपनी से अलग होकर एक अलग फ़िल्म कंपनी बनाने का फ़ैसला किया.

ये चार शिष्य थे- केशवराव धायबर, विष्णुपंत दामले, शेख़ फत्तेलाल और वी. शांताराम. लेकिन पैसे थे नहीं, इसलिए कोल्हापुर के मशहूर जौहरी सीताराम कुलकर्णी को बतौर पांचवा साझीदार अपने साथ जोड़ा. फिर 15,000 रुपये के साथ 1 जून 1929 को कोल्हापुर की मंगलवार पेठ में एक नयी फ़िल्म कंपनी की नींव रखी गयी- नाम दिया गया प्रभात फ़िल्म कंपनी.

विष्णुपंत दामले तकनीकी स्तंभ थे, तो केशवराव धायबर तकनीकी और साउंड इंजीनियरिंग के ज्ञाता, एस. फत्तेलाल शानदार आर्ट डायरेक्टर. हालांकि, आगे चलकर इन तीनों ने भी कंपनी के लिए फ़िल्में निर्देशित कीं, लेकिन शुरुआत में रचनात्मक कंट्रोल और निर्देशन की ज़िम्मेदारी संभाली वी शांताराम ने, जो प्रभात फ़िल्म कंपनी और भारत के बेहतरीन फ़िल्मकार के रूप में जाने गए.

कंपनी की शुरुआती 6 फ़िल्में मूक फ़िल्में थीं, जिनका निर्देशन वी. शांताराम ने किया. पहली फ़िल्म थी भगवान कृष्ण और कंस की कहानी पर बनी 'गोपाल कृष्ण' (1929) जो बड़ी हिट रही. इसके बाद जो बड़ी फ़िल्म शांताराम ने बनायी, वो थी, उदयकाल (1931). ये फ़िल्म शिवाजी की वीरता की दास्तान थी.

शिवाजी की भूमिका में भी शांताराम ही थे. आज के दौर में जब तानाजी, पृथ्वीराज, और हालिया ब्लॉकबस्टर छावा की चर्चा हर जगह है, तो ये जानना ज़रूरी है कि तकरीबन सौ साल पहले ख़ामोश फ़िल्मों के ज़रिए भी प्रभात फ़िल्म कंपनी और वी. शांताराम जैसे फ़िल्मकार भारतीय परिवेश और इतिहास की बात कर रहे थे.

BBC Film Heritage Foundation आलमआरा के आख़िरी सीन में मौजूद उस फ़िल्म के सभी कलाकार

सिनेमा में असली क्रांति आयी साउंड से. बोलती फ़िल्मों का आगमन बड़ा गेमचेंजर था.

1931 में भारत की पहली बोलने वाली फ़िल्म आलमआरा रिलीज़ हुई, जिसे आर्देशीर इरानी ने निर्देशित किया था.

प्रभात फ़िल्म कंपनी के साझीदारों ने भी फ़ैसला कर लिया कि सिनेमा का भविष्य बोलती फ़िल्में ही हैं. अगले ही साल प्रभात फ़िल्म कंपनी की पहली बोलती मराठी फ़िल्म 'अयोध्येचा राजा' रिलीज़ हुई.

ये राजा हरिश्चंद्र की पौराणिक कथा पर आधारित थी. ये वही कहानी थी, जिस पर दादा साहब फाल्के ने 1913 में मूक फ़िल्म राजा हरिश्चंद्र बनायी थी.

जानते हैं प्रभात फ़िल्म कंपनी की इस फ़िल्म को मराठी के साथ-साथ हिंदी में भी 'अयोध्या के राजा' नाम से बनाया गया था.

इसकी शूटिंग भी एकसाथ ही की गयी थी यानी पहले मराठी सीन की शूटिंग होती, फिर उसी सेट पर हिंदी का सीन फ़िल्माया जाता. दो भाषाओं में बनी ये भारत की पहली बोलती फ़िल्म बनी.

BBC Getty Images फ़िल्म निर्देशक वी. शांताराम

प्रभात फ़िल्म कंपनी पर शोध करने वाले ज़्यादातर लोग मानते हैं कि जहां तक क्रिएटिव योगदान की बात है, यहां पर वी. शांताराम वन-मैन आर्मी थे.

निर्देशन के साथ शांताराम को स्टूडियो के बुनियादी ढांचे और विभिन्न विभागों जैसे एडिटिंग, सिनेमाटोग्राफी, अभिनेता प्रशिक्षण और कॉस्ट्यूम की गहरी समझ थी.

फ़िल्मों में साउंड आने के बाद मराठी सिनेमा में पहले साल में कुल आठ बोलती फ़िल्में बनीं. उनमें से तीन प्रभात फ़िल्म कंपनी की थीं- अयोध्येचा राजा, अग्निकंकण और माया मच्छिंद्र. तीनों फ़िल्मों के डायरेक्टर शांताराम ही थे.

उन्होंने फ़ैसला किया कि रंगीन फ़िल्म बनाएंगे, जिसकी प्रोसेसिंग जर्मनी में होगी.

महाभारत के कीचक वध पर आधारित इस फ़िल्म का नाम रखा गया सैरंध्री. इस कलर फ़िल्म की शूटिंग प्रभात स्टूडियो में ही हुई. इसके बाद शांताराम कलर प्रोसेसिंग के लिए फ़िल्म को जर्मनी के मशहूर उफ़ा स्टूडियो लेकर गए. लेकिन जर्मनी के स्टूडियो के बर्ताव से शांताराम ख़ुश नहीं थे. प्रोसेसिंग उनके मन मुताबिक नहीं हुई और फ़िल्म को ब्लैक एंड व्हाइट में ही रिलीज़ करना पड़ा.

BBC FTII प्रभात स्टूडियो का एक बड़ा हिस्सा एफ़टीआईआई का कैंपस है

बेहतर बुनियादी ढांचे की ज़रूरत, विस्तार की योजना एवं सुविधाओं की उपलब्धता को महसूस करते हुए, 1933 में प्रभात फ़िल्म कंपनी पुणे शिफ्ट हो गयी जो कोल्हापुर के मुकाबले मुंबई के क़रीब था.

एक साल बाद, पुणे में 11 एकड़ में फैला विशाल प्रभात स्टूडियो तैयार हुआ. विष्णुपंत दामले ने बड़ी मेहनत से भूमिगत वायरिंग, वातानुकूलित संपादन कक्ष और आधुनिक ढांचे से इसे तकनीकी रूप से देश का बेहतरीन स्टूडियो बना दिया था.

इसी स्टूडियो से प्रभात कंपनी ने भारत में कुछ सबसे प्रसिद्ध शुरुआती साउंड फ़िल्मों का निर्माण किया. अगले 8 साल प्रभात फ़िल्म कंपनी का सुनहरा दौर था. यहां के नए साऊंडप्रूफ़ टिन के स्टूडियो में जिस पहली फ़िल्म का निर्माण हुआ उसका नाम था- अमृत मंथन (1934).

मानव और पशु बलि की पृष्ठभूमि पर बनी ये फ़िल्म अंधविश्वास और धार्मिक कट्टरता के ख़िलाफ़ संदेश देती है. फ़िल्म अमृत मंथन सिल्वर जुबली मनाने वाली पहली हिंदी फ़िल्म बनी. इसके बाद अगली फ़िल्म पुरुषप्रधान व्यवस्था के ख़िलाफ़ एक औरत की जंग पर आधारित फ़िल्म अमर ज्योति (1936) थी.

1930 के मध्य तक आते-आते, देश में मूक फ़िल्में धीरे-धीरे ख़त्म होती गईं. सिनेमा ने अपनी बोलती धारा को पहचान लिया था, और प्रभात फ़िल्म कंपनी, देश के "बिग थ्री" स्टूडियोज़ की श्रेणी में शामिल हो गया, जिसमें कलकत्ता के न्यू थिएटर और मुंबई के बॉम्बे टॉकीज़ जैसे प्रतिष्ठित नाम शामिल थे.

BBC SANT TUKARAM - PRABHAT FILM COMPANY प्रभात फ़िल्म कंपनी की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर 1936 में रिलीज़ हुई फिल्म 'संत तुकाराम' थी

शांताराम बतौर फ़िल्मकार प्रभात फ़िल्म कंपनी का सबसे बड़ा नाम बने मगर कंपनी के दूसरे साझेदार भी पीछे नहीं रहे. ये बात इतिहास में दर्ज है कि प्रभात फ़िल्म कंपनी की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर 1936 में रिलीज़ हुई फ़िल्म 'संत तुकाराम' थी.

प्रभात की ये सबसे बड़ी सिनेमाई उपलब्धि साबित हुई. इस फ़िल्म का निर्देशन वी. शांताराम ने नहीं बल्कि विष्णु दामले और शेख फत्तेलाल ने किया था. 1937 में वेनिस फ़िल्म फ़ेस्टिवल में इसे साल की तीन सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक के रूप में सम्मानित किया गया.

1937 के बाद प्रभात की फ़िल्मों में एक नया स्वर सुनाई देने लगा—सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने और बदलाव की अलख जगाने का स्वर. इन सामाजिक फ़िल्मों की जड़ें कहीं न कहीं राष्ट्रवादी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी थीं. 1936 में बॉम्बे टॉकीज़ की अछूत कन्या की सफलता ने दिखाया कि समाज की सच्चाइयों को दिखाने वाली फ़िल्में न केवल दर्शकों को झकझोरती हैं, बल्कि कामयाब भी होती है.

1937 से लेकर 1941 तक जो अगली तीन फ़िल्में वी. शांताराम ने निर्देशित कीं उन्होंने साफ़ इशारा कर दिया कि क्यों उन्हें भारतीय सिनेमा का महान फ़िल्मकार माना जाता है. उनकी बनाई मराठी और हिंदी की त्रयी (ट्राइलॉजी) कुंकू/दुनिया ना माने (1937), मानूस/आदमी (1939) और शेजारी/पड़ोसी (1941) भारतीय समाज के ज्वलंत मुद्दों पर सशक्त फ़िंल्में थीं.

कुंकू/दुनिया ना माने नारी मुक्ति के लिए आवाज़ उठाती एक महिला की कहानी थी जो एक बड़ी उम्र आदमी से बेमेल शादी करने से मना कर देती है. मानूस/आदमी ने वेश्या और पुलिस कांस्टेबल के बीच एक संवेदनशील और जटिल प्रेम कहानी को पर्दे पर उकेरा.

वहीं शेजारी/पड़ोसी- दो पड़ोसियों की कहानी थी- जिनमें एक हिंदू है और दूसरा मुस्लिम. इसमें सांप्रदायिक सद्भाव की ज़रूरत को गहरे और प्रभावशाली तरीक़े से उजागर किया. अफ़सोस कि ये प्रभात कंपनी के लिए शांताराम की आख़िरी फ़िल्म साबित हुई. वजह बनी एक प्रेम कहानी.

कंपनी में सामाजिक ज़िम्मेदारी सिर्फ़ फ़िल्मों में ही नहीं, असली जीवन में भी ज़रूरी थी.

उस दौर में फ़िल्मों के बारे में सामाजिक धारणा बहुत अच्छी नहीं होती थी लेकिन प्रभात ने मध्यम वर्ग के सामाजिक मानदंडों का पालन करते हुए एक साफ़-सुथरी संस्था के रूप में अपनी छवि बनाए रखने की दिशा में बहुत मेहनत की.

देश की दूसरी फ़िल्म कंपनियों से अलग खासतौर पर अभिनेत्रियों और महिला कर्मियों के लिए ये बेहतर और सुरक्षित जगह मानी जाती थी, जहां अनुशासन के सख्त नियम लागू थे. स्टूडियो के भीतर महिला कलाकारों और उनके सहकर्मियों के बीच व्यक्तिगत संबंधों पर सख्त मनाही थी, ताकि काम का माहौल हमेशा गरिमामय बना रहे.

स्टूडियो का एक अलिखित नियम था कि कंपनी का कोई भी साझीदार किसी भी हीरोइन के साथ अफे़यर नहीं कर सकता था.

BBC FTII एफ़टीआईआई में वी शांताराम के नाम से एक छोटा तालाब भी है

ख़ास बात ये थी कि ये सारे नियम सिर्फ़ प्रभात फ़िल्म कंपनी के स्टाफ़ पर ही नहीं उनके मालिकों पर भी पूरी तरह लागू थी. कंपनी के स्टार निर्देशक और एक्टर वी. शांताराम पर भी. कंपनी के बिखराव में इस नियम ने भी ख़ास भमिका निभाई.

प्रभात फ़िल्म कंपनी पर बनी मशहूर डॉक्यूमेट्री 'प्रभात फेरी' में मशहूर फ़िल्म आर्काइविस्ट और नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ़ इंडिया (एनएफ़एआई) के फ़ाउंडर व पूर्व डायरेक्टर स्वर्गीय पीके नायर ने बताया था.

उन्होंने कहा था, "स्टूडियो की झील के पास वाला वो झूला ऐतिहासिक है क्योंकि यहीं से शांताराम और जयश्री के बीच रोमांस की शुरुआत हुई थी. स्टूडियो के साझीदारों के बीच ये अलिखित नियम था कि आप हीरोइन के साथ अफे़यर नहीं कर सकते. अगर करेंगे तो आपको स्टूडियो छोड़ना होगा."

"पहले केशवराव ढयबर के साथ हुआ जब उन्हें फ़िल्म अग्निकंकण की हीरोइन नलिनी टोरकट से इश्क हो गया. ढयबर को स्टूडियो छोड़ना पड़ा. और स्टूडियो छोड़ने वाले अगले व्यक्ति थे शांताराम क्योंकि वो फ़िल्म पड़ोसी की हीरोइन जयश्री (जो उनकी पहली फ़िल्म थी) के इश्क में पड़ गए. तो ज़ाहिर है आप या तो अपने रिश्ते की गरिमा खो दें या फिर स्टूडियो का अनुशासन. तो उन्हें स्टूडियो छोड़ना पड़ा."

वैसे चर्चा ये भी थी कि शांताराम स्वतंत्र रूप से अपना बैनर खड़ा करना चाहते थे इसलिए उन्होंने 1942 में प्रभात को अलविदा कहा और बंबई चले गए. प्रभात फ़िल्म कंपनी के लिए ये बहुत बड़ा झटका था. शांताराम कंपनी का अहम स्तंभ थे और ज़्यादातर कामयाब फ़िल्में उन्होंने ही निर्देशित की थीं.

पीके नायर ने कहा था, "ये (कंपनी के) पतन का एक बड़ा कारण था जो उनके जाने से शुरू हुआ. उनकी कमी को पूरा करने वाला कोई नहीं मिला. प्रत्येक तकनीशियन पर इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा."

शांताराम ने बंबई जाकर अपना बैनर 'राजकमल कलामंदिर' लॉन्च किया. वहीं प्रभात कंपनी संभालने वाले दामले बुरी तरह बीमार पड़ गए. कुछ कर्मचारियों को शांताराम ने अपनी नयी कंपनी में नौकरी दे दी.

1944 में प्रभात कंपनी की आख़िरी कामयाब फ़िल्म राम शास्त्री रिलीज़ हुई. इसी साल गुरु दत्त ने बतौर डांस डायरेक्टर और असिस्टेंट डायरेक्टर प्रभात कंपनी को ज्वाइन किया.

Getty Images देव आनंद

देव आनंद भी इसी समय पुणे में थे क्योंकि प्रभात की फ़िल्म हम एक हैं (1946) से उन्हें बतौर हीरो लॉन्च किया जा रहा था.

हालांकि, तब तक प्रभात फ़िल्म कंपनी का सुनहरा दौर पीछे छूट चुका था. देव आनंद और गुरु दत्त की दोस्ती इसी फ़िल्म स्टूडियो में हुई और दोनों ही कुछ समय बाद बंबई आ गए जहां वो हिंदी सिनेमा के लीजेंड बने.

1946 तक आते आते प्रभात फ़िल्म कंपनी के अस्तित्व पर संकट के बादल गहराने लगे. हालांकि मुख्य टीम का बिखरना और कंपनी के आर्थिक संकट भी इसके ज़िम्मेदार थे, लेकिन वर्षों तक जिस संगठित स्टूडियो सिस्टम ने भारतीय सिनेमा को दिशा दी थी, उसके बिखराव की शुरुआत होने लगी थी.

देखते ही देखते, बड़े नाम प्रभात से विदा लेने लगे. जो कलाकार कल इसकी रीढ़ थे, वे अब स्वतंत्र उड़ान भरने लगे.

पी.के नायर ने स्टूडियो के आख़िरी वर्षों को याद करते हुए कहा था, "वे पूरी तरह बंबइया फ़िल्में बनाने पर ज़ोर देने लगे…पूरी तरह से कमर्शियल फ़िल्में. लेकिन वे पूरे मन से नहीं कर पा रहे थे. ये वो बस अपने सर्वाइवल के लिए कर रहे थे और वो फ़िल्में चली नहीं,"

समय बदल रहा था, और बदलाव हमेशा आसान नहीं होते. बड़े स्टूडियो, जो कभी अपनी आत्मनिर्भरता पर गर्व करते थे, अब भारी ख़र्चे के बोझ तले दबने लगे. जब आर्थिक दबाव बढ़ा, तो फ़िल्मों की विषय-वस्तु और गुणवत्ता पर भी असर पड़ने लगा. प्रभात का सुनहरा दौर ढल चुका था. आख़िरकार, 13 अक्टूबर 1953 को प्रभात फ़िल्म स्टूडियो के दरवाजे़ बंद हो गए.

आज प्रभात स्टूडियो एक बड़ा हिस्सा एफ़टीआईआई का कैंपस है. स्टूडियो के एक हिस्से में म्यूज़ियम भी है जहां प्रभात फ़िल्म कंपनी की यादें संजोयी गयी हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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