"हम शेख़ हसीना को हटा सकते हैं तो इन्हें भी हटा सकते हैं", बांग्लादेश में ग़ुस्सा और डर का माहौल

'डेविल या शैतान का मतलब क्या होता है? हमारा निशाना उस डेविल पर है जो देश को अस्थिर करता है, जो क़ानून का पालन नहीं करता. हमारे निशाने पर चरमपंथी और शरारती तत्व हैं'.
बांग्लादेश के गृह मंत्रालय के मुखिया लेफ़्टिनेंट जनरल जहाँगीर आलम चौधरी (रिटायर्ड) ने हाल ही में एक बयान में 'ऑपरेशन डेविल हंट' को इन शब्दों में समझाया था.
ऑपरेशन शुरू होने के 18 दिनों में 26 फरवरी तक सरकारी आँकड़ों के अनुसार 9,000 से ज़्यादा लोगों की गिरफ़्तारी हुई है और रोज़ लोगों की धर-पकड़ जारी है.
आख़िर क्या है ऑपरेशन डेविल हंट की कहानी? क्या अब आम नागरिक सुरक्षित महसूस कर रहे हैं? क्या क़ानून तोड़ने वालों को बचाया जा रहा है? नोबेल विजेता यूनुस की अंतरिम सरकार क्या कह रही है?
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तकरीबन छह महीने पहले, उग्र होते छात्र आंदोलन के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख़ हसीना देश छोड़कर भारत में शरण लेने को मजबूर हो गई थीं.
पांच फ़रवरी को उनकी पार्टी अवामी लीग के वेरिफ़ाइड फ़ेसबुक पेज पर एलान हुआ कि वे ऑनलाइन एक सभा को संबोधित करेंगी.
हसीना का विरोध करने वाले कुछ छात्रों और राजनीतिक नेताओं ने इस एलान के बाद 32 धानमोंडी को ध्वस्त करने की धमकी दे डाली.
ये शेख हसीना के पिता, बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व करने वाले और फिर पहले प्रधानमंत्री बने शेख़ मुजीबुर रहमान का घर और दफ़्तर हुआ करता था जिसे म्यूज़ियम बना दिया गया था.
ऑनलाइन सभा के एलान के कुछ ही घंटे में, सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी में, एक उग्र भीड़ ने इमारत में आग लगाई और बुलडोज़र तक का इस्तेमाल कर उसे ध्वस्त कर दिया.
यह पांच फरवरी की शाम को शुरू हुआ और अगले दिन तक चला.
हसीना की पार्टी अवामी लीग के दफ़्तरों और उसके कई नेताओं के घरों को भी निशाना बनाया गया. ढाका शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर ग़ाज़ीपुर में एक नेता के घर पर जब हमला हुआ तो स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया और 17 लोग घायल हो गए और एक की मौत हो गई.
हज़ारों गिरफ़्तारियाँ, पर नागरिक असुरक्षितग़ाज़ीपुर की घटना के बाद आठ फ़रवरी को प्रशासन ने देश भर में सेना, अर्धसैनिक बलों और पुलिस का जॉइंट ऑपरेशन शुरू किया. 'डेविल हंट' नाम के इस ऑपरेशन में 26 फरवरी तक 9,000 से ज़्यादा लोगों की गिरफ़्तारी हुई.
इतने लोगों की ग़िरफ़्तारी के बाद देश में क़ानून व्यवस्था की स्थिति तो सुधर चुकी होनी चाहिए. ढाका और आसपास के लोगों से बात करें और आए दिन हो रहे प्रदर्शनों को देखें तो तस्वीर उलटी असुरक्षा और भय की दिखती है. लेकिन ऐसा क्यों है?
ढाका में एक छात्र नेता नाज़िफ़ा जन्नत ने बताया, "मैं इस देश में रहना चाहती हूँ लेकिन सबसे पहले मुझे यहाँ बेहतर सुरक्षा चाहिए. और यह सिर्फ़ मेरे मन की बात नहीं बल्कि सभी लोगों के मन में है. दिन दहाड़े लोगों पर हमले हो रहे हैं. अपराधियों में किसी किस्म का डर हो, ऐसा लगता नहीं."
हाल में ढाका यूनिवर्सिटी के पास हुए एक प्रदर्शन में एक महिला ने तो यहाँ तक कह दिया, "अगर पिछली सरकार को हटा कर आपको बिठाया है, तो आपको कैसे हटाना है, यह भी हम जानते हैं."
हाल में छात्र संगठनों ने क़ानून व्यवस्था पर सवाल उठाए और ढाका में सचिवालय, शहीद मीनार जैसी जगहों पर धरने दिए. छात्रों के अलावा मज़दूर, किसान, सुरक्षाकर्मी और डॉक्टर भी अपनी अपनी मांगों के समर्थन में सड़कों पर उतरे हैं.
प्रदर्शन कर रहे कुछ छात्र और आम लोग तो गृह मंत्रालय के मुखिया जनरल जहाँगीर चौधरी के इस्तीफ़े की मांग भी उठाते हैं.
ऑपरेश 'डेविल हंट' के 15 दिनों के बाद, एक सभा में बांग्लादेश के सेनाध्यक्ष जनरल वकार-उज़-ज़मां ने कहा, "...बिगड़ रही क़ानून व्यवस्था के पीछे कुछ कारण हैं... हम झगड़ने में मसरूफ़ हैं..."
बांग्लादेश के सेनाध्यक्ष ने ये बात स्वीकारी कि पुलिस काम नहीं कर रही.
जनरल ज़मां ने कहा, "...आज पुलिस इसलिए काम नहीं कर रही क्योंकि उनके ख़िलाफ़ बहुत सारे मामले दर्ज किए गए हैं... उनमें खलबली है...यदि आपको लगता है कि इनका रुतबा घटाकर देश में शांति और अनुशासन कायम हो सकता है, तो ऐसा नहीं होने वाला है…"
"यदि आप (राजनीतिक दल) आपसी छींटाकशी और एक दूसरे को मारना या ज़ख्मी करना बंद नहीं कर सकते तो देश की स्वतंत्रता और प्रभुसत्ता को ख़तरा है."
लेकिन पुलिस के ख़िलाफ़ मामले क्यों दर्ज हैं?
अख़बार 'द डेली स्टार' के संपादक महफ़ूज़ आनम बताते हैं, "पुलिस विभाग हसीना सरकार के साथ सबसे सार्वजनिक रूप से जुड़ा हुआ था. (हसीना के शासनकाल में हुई कार्रवाई के कारण) पुलिस के ख़िलाफ़ अब भी जनता में आक्रोश है. अंतरिम सरकार पुलिस के इस्तेमाल को लेकर काफ़ी सावधान है और इन बातों ने पुलिस के प्रभावी होने पर असर डाला है."
हम आगे आपको ये बताएँगे कि शेख़ हसीना के कार्यकाल के आख़िरी दिनों पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में पुलिस-प्रशासन की कारगुज़ारी पर क्या टिप्पणियाँ की गई हैं.
पिछले साल 5 अगस्त से, यानी छह महीने से, शेख़ हसीना भारत में हैं और बांग्लादेश में उनके ख़िलाफ़ कई आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं. बांग्लादेश की सरकार ने भारत से औपचारिक तौर पर उनके प्रत्यर्पण की माँग की है, जिसकी पुष्टि भारत सरकार कर चुकी है.
कुछ ही दिन पहले संयुक्त राष्ट्र ने बांग्लादेश में शेख़ हसीना के शासनकाल के आख़िरी दिनों की घटनाओं पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है.
संयुक्त राष्ट्र की जाँच रिपोर्ट के मुताबिक़, छात्र आंदोलन के समय हुए विरोध प्रदर्शनों में 15 जुलाई से 5 अगस्त तक कम से कम 1400 लोग मारे गए, जिनमें से कई प्रशासन की चलाई गोलियों का निशाना बने और अनेक घायल हुए. पुलिस के कम से कम 44 कर्मचारी भी मारे गए.
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार मामलों के मुखिया वोल्कर तुर्क के अनुसार, "ये कहने का पर्याप्त आधार है कि तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व के इशारे पर प्रदर्शनों को दबाने के लिए सैकड़ों हत्याएँ और मानमाने तरीके से गिरफ़्तारियां हुईं."
उस समय हुई हिंसा को लेकर अब भी गुस्सा है. कुछ छात्र नेता तो अपने बयानों में 32 धानमोंडी में हाल में हुई तोड़फोड़ और हमलों के समर्थन में भी नज़र आए.
हमने छात्र आंदोलन के कुछ नेताओं से क़ानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए, बिना रोकटोक, स्वतंत्रता संग्राम के नेता शेख़ मुजीबुर रहमान के घर-दफ़्तर 32 धानमोंडी को ध्वस्त करने के बारे में पूछा.
स्टूडेंट्स अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन के एक नेता, आरिफ़ुल इस्लाम ने कहा, "यह तोड़फोड़ दरअसल एक प्रतिक्रिया थी. अगर लोग 32 धानमोंडी पर हमला करना चाहते तो वह पिछले छह महीनों में कर सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ."
"यहाँ के लोगों का पुलिस से भरोसा उठ चुका है और इसीलिए कई बार कानून को अपने हाथ में ले बैठते हैं. वहाँ जो हुआ वह शेख हसीना के लगातार आ रहे बयानों की वजह से हुआ."
32 धानमोंडी के ध्वस्त होने और ग़ाजीपुर की हिंसा के बाद अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस ने सात फ़रवरी को कहा था कि शेख़ हसीना और उनकी पार्टी से जुड़े किसी भी व्यक्ति की संपत्ति पर हमले बंद होने चाहिए.
लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि अवामी लीग और हसीना के प्रति लोगों में ग़ुस्सा है.
सात फ़रवरी को हसीना सरकार में मंत्री रहे एके एम मोज़म्मेल हक़ के गाज़ीपुर स्थित घर पर हमला हुआ.
पुलिस के अनुसार, हिंसक झड़पों में 17 लोग ज़ख़्मी हुए और एक की मौत हो गई और ज़ख़्मियों में ज़्यादातर छात्र थे.
ग़ाज़ीपुर में हिंसा के जवाब में हुई कार्रवाई के लिए अवामी लीग को ज़िम्मेदार ठहराया गया और अगले दिन 'मार्च टू गाज़ीपुर' कार्यक्रम की घोषणा हुई.
छात्रों की मांग पर ही अंतरिम सरकार ने 8 फ़रवरी को ऑपरेशन 'डेविल हंट' की घोषणा कर दी.
गिरफ़्तारियां शुरू हो गईं. गिरफ़्तार किए गए लोगों के परिजन भयभीत हैं और आसानी से बात करने को राज़ी नहीं होते हैं.
काफ़ी इंतज़ार के बाद गाज़ीपुर निवासी 24 वर्षीय अतिकुर रहमान का परिवार हमसे मिला.
परिवार ने बताया कि अतिकुर रहमान सिम कार्ड बेचते हैं और एक दुकान से अपना व्यवसाय चलाते हैं.
उनकी पत्नी अफ़रजा अख़्तर मीम बताती हैं, "हमें पता चला कि उन पर गैरकानूनी गतिविधियों में हिस्सा लेने और कॉकटेल बम फेंकने के आरोप लगाए गए हैं. ये सभी झूठे आरोप हैं."
रहमान की पत्नी कहती हैं, "दरअसल, सितंबर 2023 में रहमान बाइक दुर्घटना में ज़ख़्मी हुए थे और उनका जबड़ा पूरी तरह टूट गया था. उनके जबड़े को मेटल प्लेट और पिन डालकर जोड़ा गया है. उन्हें खाना चबाने में भी दिक्कत होती है और जेल में होने के कारण दवा समय पर नहीं मिल पा रही है. हम चाहते हैं कि सरकार हमारी मदद करे."
उनके पिता ने बीबीसी के साथ अपने बेटे के इलाज संबंधी कई दस्तावेज़ साझा किए. परिवार रहमान के अवामी लीग या किसी भी पार्टी से जुड़े होने से साफ़ इनकार करता है.

कैंसर के मरीज़ और अवामी लीग के सदस्य रहे, गाज़ीपुर निवासी 75 वर्षीय मोहम्मद मोमेनुद्दीन को भी ऑपरेशन 'डेविल हंट' के तहत हिरासत में लिया गया.
अपना नाम ना बताने की शर्त पर उनकी एक रिश्तेदार ने कहा, "पिछले पाँच सालों से वह काफ़ी बीमार हैं. वह किसी हिंसा या अपराध का हिस्सा कैसे बनेंगे? दरअसल रात करीब डेढ़ बजे पुलिस उन्हें यह कहते हुए ले गई कि वे सिर्फ उनसे बात करना चाहते हैं. लेकिन जब वह नहीं लौटे तो हम थाने गए और उन्हें लॉकअप में देखा."
हमने उनसे पूछा कि इस ऑपरेशन को लेकर वह क्या सोचती हैं?
वो नाराज़ हो गईं. वो बोलीं, "यह बेहद दुखद और पीड़ादायक है. आप किसी इंसान को डेविल या शैतान कैसे कह सकते हैं? वो अवामी लीग के सदस्य थे और यही उनका एकमात्र अपराध है."
अवामी लीग पर बैन लगाए जाने की माँग अगस्त के बाद से उठती रही है लेकिन फ़िलहाल ना तो पार्टी पर बैन है और ना ही पार्टी की सदस्यता ग़ैर क़ानूनी है.
जब बीबीसी ने गाज़ीपुर के पुलिस कमिश्नर मोहम्मद नज़मुल करीम ख़ान से ऐसे मामलों के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, "केवल उन लोगों को हिरासत में लिया गया हैं जिन पर ठोस आरोप हैं."
बीबीसी ने उनसे जानना चाहा कि अवामी लीग के पूर्व मंत्री के घर पर हुई हिंसा और तोड़फोड़ की शुरुआत करने वाले हमलावरों में से क्या किसी को गिरफ़्तार किया गया है?
ग़ाज़ीपुर के मेट्रोपोलिटन पुलिस कमिश्नर का कहना था, "झड़पों और तोड़फोड़ के समय अगर कोई शिकायत आए तो हम कार्रवाई कर सकते हैं. शिकायत के न होने पर भी हम स्वत: संज्ञान लेकर कार्रवाई कर सकते हैं."
बीबीसी ने उनसे पूछा कि फिर क्या एक्शन लेने से कोई रोक रहा है?
पुलिस कमिश्नर मोहम्मद नज़मुल करीम ख़ान का कहना था, "हमारे पास अब तक कार्रवाई करने के लिए किसी किस्म की जानकारी नहीं है."
मुजीब के घर तोड़फोड़ पर यूनुस सरकार ने क्या कियाबांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रेस सचिव शफ़ीक़ूल आलम ने हिंसक वारदातों के मामलों में कार्रवाई न होने के आरोपों पर कहा, "हमने लगभग हर जगह पुलिस भेजी. हमने 32 धानमोंडी में सेना भेजी... यह तोड़फोड़ ग़लत है, लेकिन बात यह है कि सुरक्षाकर्मी वहाँ हज़ारों की भीड़ के सामने कुछ करने की हालत में नहीं थे."
बीबीसी ने सरकार के प्रेस सचिव से स्पष्ट पूछा कि यदि तोड़फोड़ अपराध है तो जिन लोगों ने अलग अलग इलाकों में ऐसा किया, उनकी गिरफ़्तारी या अन्य कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
उनका कहना था, "हम जांच कर रहे हैं और अगर उनकी पहचान हो जाती है तो क़ानून अपना काम करेगा. हमारी स्थिति स्पष्ट है. हम क़ानून व्यवस्था में सुधार करना चाहते हैं. कई नागरिकों ने शिकायत की है कि लूटपाट की घटनाएं बढ़ गई हैं. ज़ाहिर तौर पर क़ानून व्यवस्था में सुधार करना सरकार का कर्तव्य है."
ढाका यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर ज़ोबैदा नसरीन कई तरह के संदेह व्यक्त करती हैं.
प्रोफ़ेसर ज़ोबैदा नसरीन कहती हैं, "छात्रों को खुश करने के लिए सरकार ने डेविल हंट की शुरुआत की. सरकार ने तब कहा था कि जिन छात्रों पर जवाबी कार्रवाई हुई उनके लिए न्याय होना चाहिए. लेकिन जब छात्र किसी पर हमला करते हैं, तो उन लोगों को भी न्याय मांगने का अधिकार है."
"उन्हें अब तक न्याय नहीं दिया गया है. शेख़ मुजीबुर रहमान के घर की तरफ़ छात्रों के नेतृत्व में बुलडोज़र जुलूस निकालने की ख़बर सोशल मीडिया पर आई थी लेकिन सरकार ने ठोस कदम नहीं उठाए. शायद सरकार भीड़ का समर्थन करती है."
समाज बँटा हुआ नज़र आता है. दबी आवाज़ में ही सही लेकिन कुछ लोग शेख़ हसीना के दौर और वर्तमान सरकार की तुलना करने लगे हैं.
अख़बार 'द डेली स्टार' के संपादक महफ़ूज़ आनम के अनुसार, "बंगबंधु शेख़ मुजीबुर रहमान के घर पर हमले से पहले, हाल में सामूहिक हिंसा की कोई घटना नहीं हुई थी. छात्र कहते हैं यह हसीना के भाषण की बात को लेकर शुरू हुआ. यह बात अपने आप में चिंताजनक है. हम नहीं चाहते कि कोई भी समूह कानून को अपने हाथ में ले."
अंतरराष्ट्रीय माननाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच ने भी सरकार को शेख़ हसीना के शासन की याद दिलाकर कहा कि 'प्रशासन को वो ग़लतियाँ दोहरानी नहीं चाहिए, बल्कि क़ानून को निष्पक्ष रूप से लागू करना चाहिए.'
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